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किसी से उनकी मंजिल का पता पाया नही जाता by MAKHMOOR DEHELVI

किसी से उनकी मंजिल का पता,  पाया नही जाता, जहाँ है वो फरिश्तों का वहाँ,  साया नही जाता॥ मोहब्बत के लिये कुछ खास दिल ,  मखसुस होते है, ये वो नगमा है जो हर एक साज पे,  गाया नही जाता॥ किसी से उनकी मंजिल का पता,  पाया नही जाता॥॥ फ़कीरी मे भी मुझको माँगने मे,  शर्म आती है, तेरा हो के किसी से हाथ,  फैलाया नही जाता॥ किसीसे उनकी मंजिल का पता,  पाया नही जाता॥॥ चमन तुमसे ही रोशन है,  बहारे तुमसे है जिंदा, तुम्हारे सामने फूलों से,  मुरझाया नही जाता॥ किसीसे उनकी मंजिल का पता,  पाया नही जाता॥॥ मोहब्बत की नही जाती,  मोहब्बत हो ही जाती है, ये शोला खुद भडकता है,  इसे भड़काया नही जाता॥ किसीसे उनकी मंजिल का पता,  पाया नही जाता॥॥ मेरे टूटे हुये पेरौ तलब का,  मुझपे एहसान है, तेरे दर से उठ के अब कही,  जाया नही जाता॥ किसीसे उनकी मंजिल का पता,  पाया नही जाता॥॥   - MAKHMOOR DEHELVI

रहीम दास के दोहे सार के साथ

रहीम दास के दोहे सार के साथ- दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय । जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे होय । संकट में हर कोई प्रभु को याद करता है खुशी में कोई नहीं, अगर आप खुशी में भी याद करते तो संताप होता ही नही । जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटी जाहिं । गिरधर मुरलीधर कहें, कछु दुःख मानत नाहिं । रहीम दास कहते हैं कि बड़े को छोटा कहने से बड़े की भव्यता कम नहीं होती, क्योंकि गिरधर को कन्हैया कहने से उनके गौरव में कमी नहीं होती । रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि । जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि । रहीम दास कहते हैं कि बड़ी चीजों को देखते हुए, छोटी चीजों को फेंक देना नहीं चाहिए,  क्योंकि जहां छोटी सुई का इस्तेमाल किया जाता है,  वहां बड़ी कृपाण क्या कर सकती है? मतलब हर चीज़ का अपना एक अनोखा मोल, उपयोग होता है । कोई भी चीज़ न बड़ी होती है और न ही छोटी होती है । रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय । टूटे पे फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ परी जाय । रहीम दास ने कहा है कि प्रेम का संबंध बहुत नाजुक होता है, इसे झटका देकर तोड़ना उचित नहीं होता । यदि यह ...

वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ परायी जाणे रे / Narsi Mehta Bhajan

वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ परायी जाणे रे पर-दुख्खे उपकार करे तोये मन अभिमान ना आणे रे वैष्णव जन तो तेने कहिये जे ... सकळ लोक मान सहुने वंदे नींदा न करे केनी रे वाच काछ मन निश्चळ राखे धन-धन जननी तेनी रे वैष्णव जन तो तेने कहिये जे ... सम-द्रिष्टी ने तृष्णा त्यागी पर-स्त्री जेने मात रे जिह्वा थकी असत्य ना बोले पर-धन नव झाली हाथ रे वैष्णव जन तो तेने कहिये जे ... मोह-माया व्यापे नही जेने द्रिढ़ वैराग्य जेना मन मान रे राम नाम सुन ताळी लागी सकळ तिरथ तेना तन मान रे वैष्णव जन तो तेने कहिये जे ... वण-लोभी ने कपट-रहित छे काम-क्रोध निवार्या रे भणे नरसैय्यो तेनुन दर्शन कर्ता कुळ एकोतेर तारया रे वैष्णव जन तो तेने कहिये जे ...

Tu khud ki khoj me nikal...तू खुद की खोज में निकल - लेखक तनवीर ग़ाज़ी

तू खुद की खोज में निकल तू किस लिए हताश है, तू चल तेरे वजूद की समय को भी तलाश है समय को भी तलाश है जो तुझ से लिपटी बेड़ियाँ समझ न इन को वस्त्र तू .. (x२) ये बेड़ियां पिघाल के बना ले इनको शस्त्र तू बना ले इनको शस्त्र तू तू खुद की खोज में निकल तू किस लिए हताश है, तू चल तेरे वजूद की समय को भी तलाश है समय को भी तलाश है चरित्र जब पवित्र है तोह क्यों है ये दशा तेरी .. (x२) ये पापियों को हक़ नहीं की ले परीक्षा तेरी की ले परीक्षा तेरी तू खुद की खोज में निकल तू किस लिए हताश है तू चल, तेरे वजूद की समय को भी तलाश है जला के भस्म कर उसे जो क्रूरता का जाल है .. (x२) तू आरती की लौ नहीं तू क्रोध की मशाल है तू क्रोध की मशाल है तू खुद की खोज में निकल तू किस लिए हताश है, तू चल तेरे वजूद की समय को भी तलाश है समय को भी तलाश है चूनर उड़ा के ध्वज बना गगन भी कपकाएगा .. (x२) अगर तेरी चूनर गिरी तोह एक भूकंप आएगा तोह एक भूकंप आएगा तू खुद की खोज में निकल तू किस लिए हताश है, तू चल तेरे वजूद की समय को भी तलाश है समय को भी तलाश है |

रहीम के दोहे

रहीम के दोहे कहि 'रहीम' संपति सगे, बनत बहुत बहु रीति। बिपति-कसौटी जे कसे, सोई सांचे मीत॥ अर्थ-  रहीम दास जी ने इस दोहे में सच्चे मित्र के विषय में बताया है। वो कहते हैं कि सगे-संबंधी रूपी संपति कई प्रकार के रीति-रिवाजों से बनते हैं। पर जो व्यक्ति आपके मुश्किल के समय में आपकी मदद करता है या आपको मुसीबत से बचाता है वही आपका सच्चा मित्र होता है। जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह। 'रहिमन' मछरी नीर को तऊ न छाँड़ति छोह॥ अर्थ-  इस दोहे में रहीम दास जी ने मछली के जल के प्रति घनिष्ट प्रेम को बताया है। वो कहते हैं मछली पकड़ने के लिए जब जाल पानी में डाला जाता है तो जाल पानी से बाहर खींचते ही जल उसी समय जाल से निकल जाता है। परन्तु मछली जल को छोड़ नहीं सकती और वह पानी से अलग होते ही मर जाती है। तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान। कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥ अर्थ-  रहीम दास जी इन पंक्तियों में कहते हैं जिस प्रकार पेड़ अपने ऊपर फले हुए फल को कभी नहीं खाते हैंए तालाब कभी अपने अन्दर जमा किये हुए पानी को कभी नहीं पीता है उसी प्रकार सज्जन व्यक्ति/परोपकारी...

गीत नही गाता हूँ / गीत नया गाता हूँ By: Atal Ji

बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं, टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूँ । गीत नही गाता हूँ । लगी कुछ ऐसी नज़र, बिखरा शीशे सा शहर, अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ। गीत नहीं गाता हूँ। पीठ मे छुरी सा चाँद, राहु गया रेखा फाँद, मुक्ति के क्षणों में बार-बार बँध जाता हूँ। गीत नहीं गाता हूँ। टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर झड़े सब पीले पात कोयल की कुहुक रात प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूँ गीत नया गाता हूँ टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी हार नहीं मानूँगा, रार नई ठानूँगा, काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ गीत नया गाता हूँ | By: Atal Bihari Vajpayee Ji

पद्मिनी-गोरा-बादल

पद्मिनी-गोरा-बादल श्री पंडित नरेंद्र मिश्र द्वारा बहुत ही अदभूद चित्रण किया है- दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई क़ुरबानी | जिसके कारन मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी || रावल रत्न सिंह को छल से कैद किया खिलजी ने काल गई मित्रों से मिलकर दाग किया खिलजी ने खिलजी का चित्तोड़ दुर्ग में एक संदेशा आया जिसको सुनकर शक्ति शौर्य पर फिर अँधियारा छाया दस दिन के भीतर न पद्मिनी का डोला यदि आया यदि ना रूप की रानी को तुमने दिल्ली पहुँचाया तो फिर राणा रत्न सिंह का शीश कटा पाओगे शाही शर्त ना मानी तो पीछे पछताओगे दारुन संवाद लहर सा दौड़ गया रण भर में यह बिजली की तरक छितर से फैल गया अम्बर में महारानी हिल गयीं शक्ति का सिंघासन डोला था था सतीत्व मजबूर जुल्म विजयी स्वर में बोला था रुष्ट हुए बैठे थे सेनापति गोरा रणधीर जिनसे रण में भय कहती थी खिलजी की शमशीर अन्य अनेको मेवाड़ी योद्धा रण छोड़ गए थे रत्न सिंह के संध नीद से नाता तोड़ गए थे पर रानी ने प्रथम वीर गोरा को खोज निकाला वन वन भटक रहा था मन में तिरस्कार की ज्वाला गोरा से पद्मिनी ने खिलजी का पैगाम सुनाया मगर वीरता का अपमानित ज्वार नही मिट प...