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बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर / हरिवंशराय बच्चन

बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर… क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है.. मैंने समंदर से सीखा है जीने का सलीक़ा, चुपचाप से बहना और अपनी मौज में रहना ।। ऐसा नहीं है कि मुझमें कोई ऐब नहीं है, पर सच कहता हूँ मुझमे कोई फरेब नहीं है जल जाते हैं मेरे अंदाज़ से मेरे दुश्मन क्यूंकि एक मुद्दत से मैंने न मोहब्बत बदली और न दोस्त बदले .!!. एक घड़ी ख़रीदकर हाथ मे क्या बाँध ली.. वक़्त पीछे ही पड़ गया मेरे..!! सोचा था घर बना कर बैठुंगा सुकून से.. पर घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना डाला !!! सुकून की बात मत कर ऐ ग़ालिब…. बचपन वाला ‘इतवार’ अब नहीं आता | शौक तो माँ-बाप के पैसो से पूरे होते हैं, अपने पैसो से तो बस ज़रूरतें ही पूरी हो पाती हैं.. जीवन की भाग-दौड़ में – क्यूँ वक़्त के साथ रंगत खो जाती है ? हँसती-खेलती ज़िन्दगी भी आम हो जाती है.. एक सवेरा था जब हँस कर उठते थे हम और आज कई बार बिना मुस्कुराये ही शाम हो जाती है.. कितने दूर निकल गए, रिश्तो को निभाते निभाते.. खुद को खो दिया हमने, अपनों को पाते पाते.. लोग कहते है हम मुस्कुराते बहोत है, और हम थक गए दर्द छुपाते छुपाते.. “खुश हूँ और सबको ...

आ धरती गोरै धोरां री / कन्हैया लाल सेठिया

आ धरती गोरा धोरां री, आ धरती मीठा मोरां री ई धरती रो रूतबो ऊंचो, आ बात कवै कूंचो कूंचो, आं फोगां में निपज्या हीरा, आं बांठां में नाची मीरा, पत्रा री जामण आ सागण, आ ही प्रताप री मा भागण, दादू रैदास कथी बाणी, पीथळ रै पाण रयो पाणी, जौहर री जागी आग अठै, रळ मिलग्या राग विराग अठै, तलवार उगी रण खेतां में, इतिहास मंडयोड़ा रेतां मंें, बो सत रो सीरी आडावळ, बा पत री साख भरै चंबळ, चुड़ावत मांगी सैनाणी, सिर काट दे दियो क्षत्राणी, ई कूख जलमियो भामासा, राणा री पूरी मन आसा, बो जोधो दुरगादास जबर, भिड़ लीन्ही दिल्ली स्यूं टक्कर, जुग जुग में आगीवाण हुया, घर गळी गांव घमसाण हुया, पग पग पर जागी जोत अठै, मरणै स्यूं मधरी मौत अठै, रूं रूं में छतरयां देवळ है, आ अमर जुझारां री थळ है, हर एक खेजड़ै खेड़ां में रोहीड़ा खींप कंकेड़ां में, मारू री गूंजी राग अठै, बलिदान हुया बेथाग अठै, आ मायड़ संता शूरां री, आ भौम बांकुरा वीरां री, आ माटी मोठ मतीरां री आ धूणी ध्यानी धीरां री, आ साथण काचर बोरां री, आ मरवण लूआं...

हे दयामय दीन पालक अज विमल निष्काम हो / बिन्दु जी

हे दयामय दीन पालक अज विमल निष्काम हो। जगतपति जग व्याप्त जगदाधार जग विश्राम हो। दिवस-निशि जिसकी प्रबल भय रोग कि हो वंदना। उस दुखी जन के लिए तुम वास्तविक सुख धाम हो। क्लेश इस कलिकाल का उसको कभी व्यापे नहीं। ह्रदय में जिनके तुम्हारा ध्यान आठो याम हो॥ एक ही अभिलाष है पूरी इसे कर दो प्रभो। मेरी रसना पे सदा रस 'बिन्दु' मय तव नाम हो॥ -- बिन्दु जी

हिंडोले झूलत दोऊ सरकार / बिन्दु जी

हिंडोले झूलत दोऊ सरकार श्री मिथिलेश लली संग राजत श्री अवधेश कुमार। दामिनि गरजि गरजि घन बरसत रिमझिम पड़त फुहार॥  झुकि झुकि लाल लली मुख निरखत मानत मोद अपार। मानहुँ अरुण ‘बिन्दु’ पंकज पर भ्रमत भ्रमर बहुबार॥ -- बिन्दु जी

ग़ैर मुमकिन है कि दुनिया अपनी मस्ती छोड़ दे / बिन्दु जी

ग़ैर मुमकिन है कि दुनिया अपनी मस्ती छोड़ दे, इसलिए तू भी यह, बेकार बस्ती छोड़ दे॥ तू न बन्दा बन ख़ुदा का, औ’ ख़ुदा तू भी न बन, हस्ती-ए-उल्फ़त में मिल जा तू अपनी हस्ती छोड़ दे॥ ख़ुद तरसाया है तेरी ख्वाहिशो को कुछ तरसती छोड़ दे, तुझको भी मन्सूर सा, मशहूर होना है अगर, जानो दिल देने से अपनी, तय हस्ती छोड़ दे। ‘बिन्दु’ आँखों के तेरे, दिखलाएँगे फस्लों भार, भरके आहों की घटाओं को, बरसती छोड़ दे॥ --  बिन्दु जी

अलामा इक़बाल की प्रसिद्ध शायरी

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल  लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे  मिटा दे अपनी हस्ती को गर कुछ मर्तबा* चाहिए कि दाना खाक में मिलकर, गुले-गुलजार होता है सितारों से आगे जहां और भी हैं अभी इश्क के इम्तिहां और भी हैं साकी की मुहब्बत में दिल साफ हुआ इतना जब सर को झुकाता हूं शीशा नजर आता है गुज़र गया वो वक़्त जब तेरे तलबगार थे हम. अब खुद भी बन जाओ तो सजदा न करेंगे..! कितने आंसू बहूँगा उस बेवफा के लिए जिसको खुदा ने मेरे नसीब मैं लिखा ही नहीं खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तकदीर से पहले खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा* क्या है दिल की बस्ती अजीब बस्ती है, लूटने वाले को तरसती है।        

प्रकृति का प्रकोप

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ये प्रकृति का प्रकोप है इसकी अनदेखी करो मत तुम, देख सकते हो तो देख लो जान सकते हो तो जान लो , अतिवृष्टि का शिकार भी हो रहे हे तो अनावृष्टि का शिकार भी बन रहे, कोई फ़सा हे नदी में तो कोई नालो में तो कोई बहेके पहुँच गया अज्ञात जगत में, फिर भी इसे समझ के संभल पाने की चाहे नही हे इन दिलों में, ये प्रकृति का प्रकोप है इसकी अनदेखी करो मत तुम, देख सकते हो तो देख लो जान सकते हो तो जान लो | आहिस्ता- आहिस्ता बढ़ रहा हे प्रभाव इसका, कहि इसकी आकस्मिक भीषणता में गाल-मेल न हो जाओ तुम, जिसमे न कोई पुकार सुनने वाला आता हे ना कोई हमदर्द जताने, चाहे शोषित मुनाफ़ा का ढेर ही क्यों न लुटा दो तुम, ये प्रकृति का प्रकोप है इसकी अनदेखी करो मत तुम, देख सकते हो तो देख लो जान सकते हो तो जान लो | छज्जे को अलंकृत करने में नीव को क्यों भुला बैठे हो, नीव के अल्पकालिक विषयांतर पर भी छज्जो को बिखरना पड़ जाता है, रख लो इन सब की समताओ का ध्यान तुम, अभी भी वक़्त है उस अनहोनी से हिफाजत करने का, ये प्रकृति का प्रकोप है इसकी अनदेखी करो मत तुम, देख सकते हो तो देख लो जान सकते हो तो जान लो |     ...